मुन्नवर राणाः उर्दु की सरल शायराना अभिवक्ति
इस सरल से व्यक्तित्व से रुबरु में एक दिन ऑफिस में एक शो के दौरान हुआ।
बचपन से मुझे उर्दु बहुत कठिन लगा करती थी लेकिन इन्हे सुनने के बाद ऎसा लगा कि उर्दु तो हिंदी का गहना है। बातों को रुमानी ढंग से कहने का एक तरीका है। शायरी के बारे में मेरी समझ कुछ ज़्यादा नहीं थी लेकिन राणा साहब को सुनने के बाद शायरी के बारे में मेरे विचार काफ़ी बदले। उनकी भाषा में सरलता तो थी ही और तजुर्बा भी उनका साफ़ साफ़ झलकता है। वो कहते हैं कि हिंदी और उर्दु तो बहने है, उर्दु के अपने तो सिर्फ कुछ सौ शब्द ही हैं बाकि तो उसने हिंदी को गले लगा लिया है। मुन्नवर कहतें है कि शायरी करने के लिए मोहब्बत होनी जरूरी है। उनके मुताबिक अगर लोगो की महबूबा उनका मुल्क हो सकता है, तो उनकी मां क्यों नहीं हो सकती। राणा ने मां पर शायरी की और बहुत खुब की...
उनके कुछ मशहुर शेयरो में से कुछ ये हैं...
लोग जो मुस्लिम कौम के लोगों को बुरा भला समझते है। लेकिन सब तो ऎसे नहीं होते। राणा उसी बात का ज़िक्र करते हुए कुछ यूं कहते हैं...
सर फिरे लोग हमें दुश्मन-ए-जाँ कहते हैं
हम जो इस मुल्क की मिट्टी को भी माँ कहते हैं
राणा कहते हैं कि शायरी करना कुछ इस तरह है जैसे हर मर्ज़ की दवा को एक छोटे से केप्सूल में घुसाना... बहुत सारी बातें, बहुत सारी भावनाए और दर्द को रुमानी तौर पर दो लाइनो में कहने को शायरी कहते है.. अब यहां देखिए मां के ऎहसास को दो सरल सी लाइनों में क्या खुब बयां किया है।
मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना
कभी लगता है कि अगर राणा ना होते तो मां को इतनी सरलता से कौन समझता और समझाता
लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती
बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती
पैसे, जायदाद और हर रिश्ते से बड़ा मां का रिश्ता होता है।
किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई
मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई
मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई
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ऐ अँधेरे! देख ले मुँह तेरा काला हो गया
माँ ने आँखें खोल दीं घर में उजाला हो गया
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इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है
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मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ
माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ
माँ ने आँखें खोल दीं घर में उजाला हो गया
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इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है
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मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ
माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ

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