पेन के ढ़क्कन से लगी वो चोट, हर ज़ख्म भर दिया करती थी।
कोई ऎसी कभी थी इस ज़िंदगी में जो मेरे लिए सबसे लड़ लिया करती थी।
मेरी भूख का ध्यान वो मुझसे ज़्यादा रखा करती थी।
बिन मिले वो मुझसे, घर को जाया नहीं करती थी।
मैं बाईक पर फ़ोन बहुत करता था, और वो हमेशा टोका करती थी।
बर्थडे पर ब्लुटूथ देकर प्रोब्लम ही सोल्व कर दी,
वो मुझे इतना क्यों समझा करती थी।
ना मुस्कान में बनावट थी, ना प्यार में रुकावट,
उस आम सी लड़की की हर बात क्यों ख़ास लगा करती थी।
जब बात नहीं किया करते थे हम, तब भी वो मुझसे बातें किया करती थी।
जो कहना होता था उसे मैसेज में लिखकर वो ड्राफ़्ट में सेव कर लिया करती थी।
उसके हंसने, मुस्कुराने, रोने और इतराने में एक अलग सी सादगी हुआ करती थी।
इस बुरे बुरे से जहां में वो दिल की बहुत साफ़ हुआ करती थी।
पास्ट से भरा ये 'थी' अगर प्रज़ेन्ट का 'है' होता तो शायद ज़िन्दगी कुछ और भी हो सकती थी।

No comments:
Post a Comment