कुछ नया नहीं हैं मेरी ज़िन्दगी में शामिल
कुछ नया नहीं हैं मेरी ज़िन्दगी में शामिल
सच कहूं तो तू पूरानी होती ही नहीं
नशा जो तेरी आंखो के प्यालों में था
इस जहां की कोई जाम वो मज़ा देती नहीं
तूझसे घंटो की वो बाते जो सुकूं देती थी
तेरे लफ़्ज़ो से प्यारी कोई धुन लगती नहीं
तेरी खुशबू जैसे फूलों का कोई सागर हो
वो महक इस ज़हन से क्यों जाती नहीं
तू हंसे तो ज़माना भी खुश लगता था
वो गूंज मेरे कानो से हटती ही नहीं
ये पता है मुझे तू अब नहीं है लेकिन
तेरे आने की आस फिर भी जाती ही नहीं
कुछ नया नहीं हैं मेरी ज़िन्दगी में शामिल
सच कहूं तो तू पूरानी होती ही नहीं

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