Tuesday, August 14, 2012

कहां है लोकतंत्र



जणतंत्र, लोकतंत्र। ये शब्द स‌ुनने में कितने अच्छे लगते है। आम हिंदी में बने इन ख़ास शब्दो को हर राजनैतिक भाषण में भी जगह मिल जाती है। किसी पार्टी का घोषणापत्र हो या नेता का ब्लॉगस‌माजस‌ेवियो की स‌ेवा हो, या आंदोलन का आलाप, इन दो शब्दो स‌े आपकी मुलाकात कमोबेश हर जगह हो जाऎगी। एक आम आदमी, जिसकी कीमत आज के स‌मय में फल वाले आम स‌े भी कम है। उस आम आदमी की रैसेपी में अगर थोड़ी बहुत पढ़ाई- लिखाई का तड़का लगा हो, और उपर स‌े स्वादानूसार जानकारी भी हो तो उसे स‌मझ में आ जाता है कि भारत में लोकतंत्र का मतलब वैसा ही है, जैसे किसी घटिया तेल में बनी बेस्वाद सब्ज़ी के ऊपर पड़ा स‌फ़ेद मख़क्न हो। प्राचीनकाल में लोकतंत्र का मतलब होता था, जनता का तंत्र यानी लोगों का राज। प्राचीनकाल इसलिए कह रहा हूं क्योंकि मेरे जन्म के बाद तो मैने इस शब्द का ये मतलब कभी महसूस ही नहीं किया। आज जब में अपने 5 माले की बिल्डिंग की छत के ऊपर खड़ा होकर अपने देश को देखने की कौशिश करता हूं, तो विचारो कि वो पार की नज़रे स‌बसे पहले एक ही स‌वाल उठाती है, कि कहां है लोकतंत्र। देश पर फ़िलहाल राज करती पार्टी की अगर बात की जाए, जिसने इस मुल्क पर स‌ाठ स‌ालों स‌े भी ज़्यादा राज किया है। तो वो तो जीता-जागता राजा प्रजा टाइप की स‌त्ता का उदाहरण है। राज के इन स‌ाठ स‌ालों में एक ही परिवार स‌ीधे या गैर-सीधे तरीके स‌े स‌त्ता पर पैर जमाए बैठा है। इनर पार्टी डेमोक्रेसी जैसे शब्द इस पार्टी के लिए महज़ स‌ंतरे के एक बीज की तरह है, जिसे जब खाने की बात आती है तो बेरहमी स‌े थूक दिया जाता है। और आज के हालात तो ऎसे लगते है जैसे ज़माना ही मुझे हिस्ट्री पढ़ा रहा हो। इतिहास के पन्नो में जो तब इस्ट इंडिया कंपनी के नाम स‌े रजिस्ट्रड थी, उसने आज इटली की एक औरत के रुप में पुन्रजन्म लिया है। तब की गुलामी को देखना तो मेरे नसीब में नहीं था। लेकिन आज मुझे वो स‌ोभाग्य कांग्रेस पाट्री की वजह स‌े मिला है। पहले कम स‌े कम ये तो था कि गुलामी, गुलामी के नाम पर ही की जाती थी। जो कुछ भी होता था खुल्लम खुला होता था। आज की स्थिती तो उस‌ बेवफ़ा माशूक की तरह है, जो वादे तो आपसे करती पर निभाती किसी और के स‌ाथ है। नाम तो आज़ादी का है, लेकिन कान को उल्टी तरह स‌े पकड़ कर, कर तो हम ग़ुलामी ही रहे है। अंधाधुंध पैसा खाया जा रहा है, और लोगों को मजबुर करके महंगाई की धुन पर नचाया जा रहा है। दंगे में अगर कोई मर जाता है तो कम स‌े कम राज करने वाले राजनेता को कोस तो स‌कते हैं। पर जो ये आदमख़ोर स‌रकार ग़रीबी और भुखमरी की तलवारो स‌े लोगो को हलाल कर रही है उसके लिए तो कानून्न इन पर आरोप भी नहीं लग स‌कते। हलाल शब्द पर थोड़ा गौर फ़रमाइयेगा क्योकिं दाने दाने का मौताज होकर जब एक ग़रीब मरता है। कर्ज़े में डूबा हुआ किसान जब आत्महत्या करता है। उस दर्द को अगर कोई देख ले तो शायद हलाल शब्द भी कम लगेगा। किसी कसाई और जल्लाद को भी अगर इन लोगों स‌े मिलवाया जाए तो शायद इन्सान होने के नाते इनको भी दया आ जाए लेकिन इस स‌रकार को तो वो भी नहीं आती। कैसी इस देश की किस्मत है कि कोई नेता एक लाख करोड़ खाकर भी डकार नहीं  लेता और एक किसान 500 रुपये के कर्ज़े के बोझ तले खुदखुशी कर लेता है। फ़िर भी दुनिया कहती है कि भारत स‌बसे बड़ा लोकतंत्र है और हम उनकी हां में हां मिलाते है। अरे काहें का लोकतंत्र, जहां आधे स‌े ज़्यादा नहीं बल्की पूरे स‌े थोड़ा स‌ा कम लोग एक वक्त की रोटी के बदले किसी को भी वोट दे देते है। और पढ़े लिखे स‌मझदार वर्ग के लोग तो वोट देना ही ज़रुरी नहीं स‌मझते। जहां राजनेता बनने की स‌बसे पहली क्वालिफ़िकेशन ही गुंडा होना है। जहां इलेक्शन एक इन्वेस्टमेंट हो और जीतने के बाद हाई रिटर्न्स की गारंटी हो। जहां भ्रष्टाचार तो असल पर ब्याज वसूल करने का तरीका हो। जहां वादे ही मुकरने के लिए किए जाते हो। जनता को देश नाम की जेल में स‌रकारी चक्की पिसाई जाती हो, और फ़िर भी स्वतंत्रता दिवस धुमधाम स‌े मनाया जाता हो। मनोज कुमार के गाने फ़ूल वॉल्यूम में चलते हो और कहा जाता हो की हम आज़ाद है। हम आज़ाद है या बेवकुफ, यहां लोकतंत्र है या तानाशाही। गद्दाफी कम स‌े कम बोल के तो तानाशाही करता था, वहां जनता पर स‌ामने स‌े तो वार होता था। ये तो मुंह छुपाकर पीठ पीछे छुरा घोपते है और जनता अपने ही राज में त्राहिमाम त्राहिमाम करती रह जाती है। उस त्राहिमाम की आवाज़ को ग़ोर स‌े स‌ुनना दोस्तो, उन शब्दो का दर्द भी चीख चीख कर यही पुछ रहा होता है- कहां है लोकतंत्र, कहां है लोकतंत्र

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