Sunday, August 26, 2012


कुछ नया नहीं हैं मेरी ज़िन्दगी में शामिल




कुछ नया नहीं हैं मेरी ज़िन्दगी में शामिल
स‌च कहूं तो तू पूरानी होती ही नहीं

नशा जो तेरी आंखो के प्यालों में था
इस जहां की कोई जाम वो मज़ा देती नहीं

तूझसे घंटो की वो बाते जो स‌ुकूं देती थी
तेरे लफ़्ज़ो स‌े प्यारी कोई धुन लगती नहीं

तेरी खुशबू जैसे फूलों का कोई स‌ागर हो
वो महक इस ज़हन स‌े क्यों जाती नहीं

तू हंसे तो ज़माना भी खुश लगता था
वो गूंज मेरे कानो से हटती ही नहीं

ये पता है मुझे तू अब नहीं है लेकिन
तेरे आने की आस फिर भी जाती ही नहीं


कुछ नया नहीं हैं मेरी ज़िन्दगी में शामिल
स‌च कहूं तो तू पूरानी होती ही नहीं


Thursday, August 16, 2012

अगर भारत पाकिस्तान का बटवारा नहीं हुआ होता तो क्या होता?

अगर भारत पाकिस्तान का बटवारा नहीं हुआ होता तो क्या होता?


सोच कर सोचो की अगर भारत पाकिस्तान का बटवारा नहीं हुआ होता तो क्या होता. 

तो शायद दोनों तरफ के नेताओ के स्विस बैंक में जोइंट अकाउंट होते
तो वीणा मल्लिक और राखी सावंत बहने होती
तो भारत पाकिस्तान की टीम सबसे मजबूत क्रिकेट टीम होती 
तो बाबा रामदेव और इमरान खान साथ साथ आन्दोलन करते 
तो भी ओलिम्पिक्स में दो रजत और चार कांस्य ही आते 

Tuesday, August 14, 2012

मुन्नवर राणाः उर्दु की स‌रल शायराना अभिवक्ति


मुन्नवर राणाः उर्दु की स‌रल शायराना अभिवक्ति



इस स‌रल स‌े व्यक्तित्व स‌े रुबरु में एक दिन ऑफिस‌ में एक शो के दौरान हुआ।
बचपन स‌े मुझे उर्दु बहुत कठिन लगा करती थी लेकिन इन्हे स‌ुनने के बाद ऎसा लगा कि उर्दु तो हिंदी का गहना है। बातों को रुमानी ढंग स‌े कहने का एक तरीका है। शायरी के बारे में मेरी समझ कुछ ज़्यादा नहीं थी लेकिन राणा स‌ाहब को स‌ुनने के बाद शायरी के बारे में मेरे विचार काफ़ी बदले। उनकी भाषा में स‌रलता तो थी ही और तजुर्बा भी उनका स‌ाफ़ स‌ाफ़ झलकता है। वो कहते हैं कि हिंदी और उर्दु तो बहने है, उर्दु के अपने तो स‌िर्फ कुछ स‌ौ शब्द ही हैं बाकि तो उसने हिंदी को गले लगा लिया है। मुन्नवर कहतें है कि शायरी करने के लिए मोहब्बत होनी जरूरी है। उनके मुताबिक अगर लोगो की महबूबा उनका मुल्क हो स‌कता है, तो उनकी मां क्यों नहीं हो स‌कती। राणा ने मां पर शायरी की और बहुत खुब की...

उनके कुछ मशहुर शेयरो में स‌े कुछ ये हैं...

लोग जो मुस्लिम कौम के लोगों को बुरा भला स‌मझते है। लेकिन स‌ब तो ऎसे नहीं होते। राणा उसी बात का ज़िक्र करते हुए  कुछ यूं कहते हैं...

सर फिरे लोग हमें दुश्मन-ए-जाँ कहते हैं
हम जो इस मुल्क की मिट्टी को भी माँ कहते हैं
 

राणा कहते हैं कि शायरी करना कुछ इस तरह है जैसे हर मर्ज़ की दवा को एक छोटे स‌े केप्सूल में घुसाना... बहुत स‌ारी बातें, बहुत स‌ारी भावनाए और दर्द को रुमानी तौर पर दो लाइनो में कहने को शायरी कहते है.. अब यहां देखिए मां के ऎहसास को दो स‌रल स‌ी लाइनों में क्या खुब बयां किया है।

मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना

 कभी लगता है कि अगर राणा ना होते तो मां को इतनी स‌रलता स‌े कौन स‌मझता और स‌मझाता

लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती

पैसे, जायदाद और हर रिश्ते स‌े बड़ा मां का रिश्ता होता है।

किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई
मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई
 
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ऐ अँधेरे! देख ले मुँह तेरा काला हो गया
माँ ने आँखें खोल दीं घर में उजाला हो गया
 
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इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है
 
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मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ
माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ
 

बेनाम स‌ा एक रिश्ता


पेन के ढ़क्कन स‌े लगी वो चोट, हर ज़ख्म भर दिया करती थी।
कोई ऎसी कभी थी इस ज़िंदगी में जो मेरे लिए स‌बसे लड़ लिया करती थी।
मेरी भूख का ध्यान वो मुझसे ज़्यादा रखा करती थी।
बिन मिले वो मुझसे, घर को जाया नहीं करती थी।
मैं बाईक पर फ़ोन बहुत करता था, और वो हमेशा टोका करती थी।
बर्थडे पर ब्लुटूथ देकर प्रोब्लम ही स‌ोल्व कर दी,
वो मुझे इतना क्यों स‌मझा करती थी।
ना मुस्कान में बनावट थी, ना प्यार में रुकावट,
उस आम स‌ी लड़की की हर बात क्यों ख़ास लगा करती थी।
जब बात नहीं किया करते थे हम, तब भी वो मुझसे बातें किया करती थी।
जो कहना होता था उसे मैसेज में लिखकर वो ड्राफ़्ट में स‌ेव कर लिया करती थी।
उसके हंसने, मुस्कुराने, रोने और इतराने में एक अलग स‌ी स‌ादगी हुआ करती थी।
इस बुरे बुरे स‌े जहां में वो दिल की बहुत स‌ाफ़ हुआ करती थी।
पास्ट स‌े भरा ये 'थी' अगर प्रज़ेन्ट का 'है' होता तो शायद ज़िन्दगी कुछ और भी हो स‌कती थी।

कहां है लोकतंत्र



जणतंत्र, लोकतंत्र। ये शब्द स‌ुनने में कितने अच्छे लगते है। आम हिंदी में बने इन ख़ास शब्दो को हर राजनैतिक भाषण में भी जगह मिल जाती है। किसी पार्टी का घोषणापत्र हो या नेता का ब्लॉगस‌माजस‌ेवियो की स‌ेवा हो, या आंदोलन का आलाप, इन दो शब्दो स‌े आपकी मुलाकात कमोबेश हर जगह हो जाऎगी। एक आम आदमी, जिसकी कीमत आज के स‌मय में फल वाले आम स‌े भी कम है। उस आम आदमी की रैसेपी में अगर थोड़ी बहुत पढ़ाई- लिखाई का तड़का लगा हो, और उपर स‌े स्वादानूसार जानकारी भी हो तो उसे स‌मझ में आ जाता है कि भारत में लोकतंत्र का मतलब वैसा ही है, जैसे किसी घटिया तेल में बनी बेस्वाद सब्ज़ी के ऊपर पड़ा स‌फ़ेद मख़क्न हो। प्राचीनकाल में लोकतंत्र का मतलब होता था, जनता का तंत्र यानी लोगों का राज। प्राचीनकाल इसलिए कह रहा हूं क्योंकि मेरे जन्म के बाद तो मैने इस शब्द का ये मतलब कभी महसूस ही नहीं किया। आज जब में अपने 5 माले की बिल्डिंग की छत के ऊपर खड़ा होकर अपने देश को देखने की कौशिश करता हूं, तो विचारो कि वो पार की नज़रे स‌बसे पहले एक ही स‌वाल उठाती है, कि कहां है लोकतंत्र। देश पर फ़िलहाल राज करती पार्टी की अगर बात की जाए, जिसने इस मुल्क पर स‌ाठ स‌ालों स‌े भी ज़्यादा राज किया है। तो वो तो जीता-जागता राजा प्रजा टाइप की स‌त्ता का उदाहरण है। राज के इन स‌ाठ स‌ालों में एक ही परिवार स‌ीधे या गैर-सीधे तरीके स‌े स‌त्ता पर पैर जमाए बैठा है। इनर पार्टी डेमोक्रेसी जैसे शब्द इस पार्टी के लिए महज़ स‌ंतरे के एक बीज की तरह है, जिसे जब खाने की बात आती है तो बेरहमी स‌े थूक दिया जाता है। और आज के हालात तो ऎसे लगते है जैसे ज़माना ही मुझे हिस्ट्री पढ़ा रहा हो। इतिहास के पन्नो में जो तब इस्ट इंडिया कंपनी के नाम स‌े रजिस्ट्रड थी, उसने आज इटली की एक औरत के रुप में पुन्रजन्म लिया है। तब की गुलामी को देखना तो मेरे नसीब में नहीं था। लेकिन आज मुझे वो स‌ोभाग्य कांग्रेस पाट्री की वजह स‌े मिला है। पहले कम स‌े कम ये तो था कि गुलामी, गुलामी के नाम पर ही की जाती थी। जो कुछ भी होता था खुल्लम खुला होता था। आज की स्थिती तो उस‌ बेवफ़ा माशूक की तरह है, जो वादे तो आपसे करती पर निभाती किसी और के स‌ाथ है। नाम तो आज़ादी का है, लेकिन कान को उल्टी तरह स‌े पकड़ कर, कर तो हम ग़ुलामी ही रहे है। अंधाधुंध पैसा खाया जा रहा है, और लोगों को मजबुर करके महंगाई की धुन पर नचाया जा रहा है। दंगे में अगर कोई मर जाता है तो कम स‌े कम राज करने वाले राजनेता को कोस तो स‌कते हैं। पर जो ये आदमख़ोर स‌रकार ग़रीबी और भुखमरी की तलवारो स‌े लोगो को हलाल कर रही है उसके लिए तो कानून्न इन पर आरोप भी नहीं लग स‌कते। हलाल शब्द पर थोड़ा गौर फ़रमाइयेगा क्योकिं दाने दाने का मौताज होकर जब एक ग़रीब मरता है। कर्ज़े में डूबा हुआ किसान जब आत्महत्या करता है। उस दर्द को अगर कोई देख ले तो शायद हलाल शब्द भी कम लगेगा। किसी कसाई और जल्लाद को भी अगर इन लोगों स‌े मिलवाया जाए तो शायद इन्सान होने के नाते इनको भी दया आ जाए लेकिन इस स‌रकार को तो वो भी नहीं आती। कैसी इस देश की किस्मत है कि कोई नेता एक लाख करोड़ खाकर भी डकार नहीं  लेता और एक किसान 500 रुपये के कर्ज़े के बोझ तले खुदखुशी कर लेता है। फ़िर भी दुनिया कहती है कि भारत स‌बसे बड़ा लोकतंत्र है और हम उनकी हां में हां मिलाते है। अरे काहें का लोकतंत्र, जहां आधे स‌े ज़्यादा नहीं बल्की पूरे स‌े थोड़ा स‌ा कम लोग एक वक्त की रोटी के बदले किसी को भी वोट दे देते है। और पढ़े लिखे स‌मझदार वर्ग के लोग तो वोट देना ही ज़रुरी नहीं स‌मझते। जहां राजनेता बनने की स‌बसे पहली क्वालिफ़िकेशन ही गुंडा होना है। जहां इलेक्शन एक इन्वेस्टमेंट हो और जीतने के बाद हाई रिटर्न्स की गारंटी हो। जहां भ्रष्टाचार तो असल पर ब्याज वसूल करने का तरीका हो। जहां वादे ही मुकरने के लिए किए जाते हो। जनता को देश नाम की जेल में स‌रकारी चक्की पिसाई जाती हो, और फ़िर भी स्वतंत्रता दिवस धुमधाम स‌े मनाया जाता हो। मनोज कुमार के गाने फ़ूल वॉल्यूम में चलते हो और कहा जाता हो की हम आज़ाद है। हम आज़ाद है या बेवकुफ, यहां लोकतंत्र है या तानाशाही। गद्दाफी कम स‌े कम बोल के तो तानाशाही करता था, वहां जनता पर स‌ामने स‌े तो वार होता था। ये तो मुंह छुपाकर पीठ पीछे छुरा घोपते है और जनता अपने ही राज में त्राहिमाम त्राहिमाम करती रह जाती है। उस त्राहिमाम की आवाज़ को ग़ोर स‌े स‌ुनना दोस्तो, उन शब्दो का दर्द भी चीख चीख कर यही पुछ रहा होता है- कहां है लोकतंत्र, कहां है लोकतंत्र